अपराधउत्तराखंड

चूड़ी पहन ली है उत्तराखंड के प्रशासन ने

जिम्मेदार कौन—धामी सरकार या पुलिस प्रशासन?

कृतिका भारद्वाज

देहरादून। कभी शांत वादियों और सुकूनभरे माहौल के लिए पहचाना जाने वाला उत्तराखंड इन दिनों खौफ के साए में जी रहा है। महज 14 दिनों के भीतर देहरादून जिले में चार सनसनीखेज हत्याओं ने कानून-व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। हैरानी की बात यह है कि इनमें तीन महिलाएं शामिल हैं, जिनकी सरेआम हत्या ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जनवरी की शुरुआत से ही प्रदेश में अपराध की रफ्तार जिस तरह बढ़ी है, उसने आम जनता के मन में डर और असुरक्षा की भावना भर दी है। साल 2026 की शुरुआत उत्तराखंड के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रही। सवा महीने के भीतर अलग-अलग जिलों में हुई नृशंस वारदातों ने यह संकेत दे दिया है कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और सिस्टम कहीं न कहीं सुस्त नजर आ रहा है।
एक के बाद एक खून से दहला दून
29 जनवरी को विकासनगर में 18 वर्षीय युवती की हत्या से जो खौफ का सिलसिला शुरू हुआ, वह थमता नजर नहीं आया। इसके दो दिन बाद 31 जनवरी को ऋषिकेश में 32 वर्षीय महिला को उसके प्रेमी ने गोली मार दी। 2 फरवरी को दून के मच्छी बाजार में 23 वर्षीय गुंजन की सरेराह चापड़ से गला रेतकर हत्या कर दी गई। इस वारदात ने बाजार में मौजूद लोगों को दहशत में डाल दिया।
और फिर 11 फरवरी को तिब्बती मार्केट में शहीद कर्नल के बेटे अर्जुन शर्मा की गोली मारकर हत्या ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। पुलिस सूत्रों के अनुसार इस हत्याकांड में भाड़े के शूटरों का इस्तेमाल किया गया। सवाल यह है कि आखिर अपराधियों को इतनी हिम्मत कौन दे रहा है कि वे सरेआम गोलियां बरसाकर फरार हो जा रहे हैं?
प्रदेश बना अपराध का हॉटस्पॉट?
देहरादून ही नहीं, प्रदेश के अन्य हिस्सों से भी चिंताजनक खबरें सामने आई हैं। 5 जनवरी को काशीपुर में जमीन विवाद में एक किसान की हत्या कर दी गई। 19 जनवरी को लोहड़ी की रात शराब की महफिल में हुए विवाद के बाद दोस्तों ने ही युवक को पत्थरों से कुचल डाला। 28 जनवरी को हरिद्वार में सरकारी भूमि की पैमाइश के दौरान दो गुटों में फायरिंग हुई।
इन घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि अपराध अब किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहा। कानून-व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं।
प्रशासन मौन क्यों?
लगातार हो रही हत्याओं के बीच आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। विपक्ष सरकार पर हमलावर है, तो जनता पूछ रही है—क्या प्रदेश का प्रशासन चूड़ी पहनकर बैठ गया है? क्या पुलिस की गश्त और खुफिया तंत्र केवल कागजों तक सीमित है?
धामी सरकार विकास और निवेश की बातें करती है, लेकिन जमीन पर कानून-व्यवस्था की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। यदि राजधानी दून में ही अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं, तो दूरदराज के इलाकों का क्या हाल होगा?
अब वक्त आ गया है कि सरकार और पुलिस प्रशासन आत्ममंथन करें। सख्त कार्रवाई और ठोस रणनीति के बिना हालात काबू में आते नजर नहीं आ रहे। वरना वह दिन दूर नहीं जब शांत उत्तराखंड की पहचान अपराध की सुर्खियों में सिमटकर रह जाएगी।

Janadesh Express

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