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UGC विवाद गहराया: नौकरशाह का इस्तीफ़ा, BJP नेता ने छोड़ा पद, मंत्री ने मीडिया से दूरी बनाई

कृतिका भारद्वाज

जनादेश/: UGC के नए दिशानिर्देशों को लेकर राज्यों में विरोध प्रदर्शन तेज़ हो गए हैं। अब यह नाराज़गी प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर तक पहुँच गई है, जिसके चलते इस्तीफ़ों का सिलसिला शुरू हो गया है। उच्च शिक्षा से जुड़ा यह नया राजनीतिक विवाद UGC द्वारा इसी महीने अधिसूचित किए गए “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता विनियम, 2026” से जुड़ा है।

इन नियमों में विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए मज़बूत तंत्र अनिवार्य किए गए हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये नियम एकतरफ़ा, अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाले हैं—जिसके कारण विरोध, इस्तीफ़े और राजनीतिक असहजता बढ़ रही है।

विवाद की जड़ क्या है?
  1. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए निम्नलिखित व्यवस्थाएँ अनिवार्य कर दी हैं:
  2. इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (Equal Opportunity Centres)
  3. इक्विटी कमेटियाँ (Equity Committees)
    24×7 शिकायत हेल्पलाइन

इनका उद्देश्य विशेष रूप से SC, ST और OBC छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव की शिकायतों का समाधान करना ह l 

UGC का कहना है कि ये नियम कैंपस में निष्पक्षता और समावेशन सुनिश्चित करेंगे, लेकिन विरोधियों की दलीलें हैं कि:

  1. भेदभाव के आरोपी व्यक्तियों के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय तय नहीं किए गए हैं
  2. नियमों से सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ “दोषी मान लेने” की मानसिकता बन सकती है
  3. अनुपालन न करने पर संस्थानों को मान्यता या फंडिंग खोने जैसे कठोर दंड का सामना करना पड़ सकता है
    इसी वजह से नियमों को वापस लेने या उनकी समीक्षा की मांग उठ रही है।
इस्तीफ़े क्यों हुए?

विवाद ने तब राजनीतिक रूप ले लिया जब एक वरिष्ठ नौकरशाह ने सरकारी सेवा से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने नीति से असहमति और उससे जुड़े विरोध को संभालने के तरीके पर सवाल उठाए।

इसके तुरंत बाद BJP के युवा मोर्चा के एक नेता ने भी इस्तीफ़ा दे दिया। उनका कहना था कि ये नियम सुधार के बजाय विभाजन को बढ़ावा दे रहे हैं और छात्रों व शिक्षकों की चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।
आलोचकों का मानना है कि ये इस्तीफ़े इस बात का संकेत हैं कि UGC नियमों का विरोध केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था के भीतर भी गहरी असहमति पैदा हो चुकी है।

सरकार की प्रतिक्रिया क्या है?

इस मुद्दे पर पूछे जाने पर गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने यह स्पष्ट नहीं किया कि नियमों की समीक्षा होगी या उन्हें अस्थायी रूप से रोका जाएगा।
अब तक सरकार की ओर से न तो परामर्श की कोई समय-सीमा बताई गई है और न ही संभावित संशोधनों का संकेत दिया गया है।
जो बदलाव एक नियामक निर्णय के रूप में शुरू हुआ था, वह अब एक बड़ा राजनीतिक और वैचारिक टकराव बन चुका है—जहाँ एक ओर जातिगत भेदभाव से निपटने की चिंता है, तो दूसरी ओर नियमों के अत्यधिक दख़ल, उचित प्रक्रिया की कमी और कैंपस में ध्रुवीकरण का डर।
इस्तीफ़ों और बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच, केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वह स्पष्ट करे—क्या UGC के ये नियम मौजूदा रूप में बने रहेंगे, या फिर उन पर पुनर्विचार किया जाएगा।

Janadesh Express

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