सड़क नहीं, इसलिए बेटे के अंतिम दर्शन को 4 किमी पैदल चले शहीद के माता-पिता

कृतिका भारद्वाज
बागेश्वर | जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए हवलदार गजेंद्र सिंह गड़िया को अंतिम विदाई देने की कहानी ने पूरे प्रदेश को भावुक कर दिया। बागेश्वर जिले के दूरस्थ गांव बीथी पन्याती तक सड़क न होने के कारण शहीद के बुजुर्ग माता-पिता को बेटे के अंतिम दर्शन के लिए चार किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।रविवार को जम्मू-कश्मीर में शहीद हुए हवलदार गजेंद्र सिंह गड़िया का पार्थिव शरीर मंगलवार को गांव लाया जाना था, लेकिन सड़क सुविधा के अभाव में यह संभव नहीं हो सका। इसके चलते पार्थिव शरीर को कपकोट डिग्री कॉलेज के मैदान में लाया गया।शहीद की माता चंद्रावती देवी और पिता धन सिंह गांव से करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर सड़क तक पहुंचे। इसके बाद उन्हें 13 किलोमीटर वाहन से यात्रा कर कपकोट पहुंचना पड़ा, जहां उन्होंने अपने बेटे के अंतिम दर्शन किए।गांव के कई लोग भी कपकोट पहुंचे, हालांकि बुजुर्गों और महिलाओं में से कई लोग दूरी और दुर्गम रास्ते के कारण वहां नहीं पहुंच सके।
एसडीएम अनिल चन्याल ने बताया कि सेना के अधिकारियों और शहीद के पिता के बीच फोन पर हुई बातचीत के बाद कपकोट डिग्री कॉलेज में कार्यक्रम तय किया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसमें प्रशासन का कोई हस्तक्षेप नहीं रहा।ग्रामीणों ने बताया कि सड़क न होने से बीथी पन्याती गांव के लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। मरीजों और गर्भवती महिलाओं को डोली के सहारे सड़क तक पहुंचाना पड़ता है।
पूर्व ग्राम प्रधान और सेवानिवृत्त कैप्टन भूपाल सिंह ने बताया कि वर्षों के प्रयासों के बावजूद गांव तक सड़क नहीं बन पाई। पोथिंग के बलिया पालत तक सड़क है, वहां से एक किलोमीटर ढलान और तीन किलोमीटर की चढ़ाई तय कर गांव पहुंचना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि कपकोट के पूर्व विधायक शेर सिंह गड़िया भी इसी गांव के मूल निवासी हैं।शहीद गजेंद्र सिंह गड़िया का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ हेलीकॉप्टर से कपकोट डिग्री कॉलेज मैदान में लाया गया। परिजनों की अश्रुपूरित विदाई के बाद शहीद की अंतिम यात्रा निकाली गई, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए।भारत माता की जय’ के नारों से पूरी कपकोट घाटी गूंज उठी। सरयू और खीरगंगा के संगम पर शहीद का सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।यह घटना न सिर्फ एक वीर सपूत की शहादत की कहानी है, बल्कि पहाड़ों में आज भी मौजूद बुनियादी सुविधाओं की कमी की एक मार्मिक तस्वीर भी पेश करती है।



