अरावली की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट सख्त: अवैध खनन व पेड़ कटाई पर तत्काल रोक, विशेषज्ञ समिति गठित होगी

कृतिका भारद्वाज
जनादेश /नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए राजस्थान सहित सभी राज्यों को अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और पेड़ कटाई तुरंत रोकने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि अरावली जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में अनियंत्रित खनन अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति पहुंचा सकता है।
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अरावली की परिभाषा को लेकर उसके पहले के आदेश पर उठी आपत्तियों को देखते हुए स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय समिति गठित की जाएगी। यह समिति वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और अन्य विशेषज्ञों से मिलकर बनेगी, जो अरावली की भौगोलिक और पर्यावरणीय स्थिति का पुनः अध्ययन कर अपनी सिफारिशें देगी।
गौरतलब है कि नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की पहचान को लेकर एक आदेश दिया था, जिसमें ऊंचाई आधारित (100 मीटर) मानक की चर्चा हुई थी। इस आदेश की व्यापक आलोचना हुई, क्योंकि इससे आशंका जताई गई कि बड़े हिस्से को अरावली की परिभाषा से बाहर कर दिया जाएगा और खनन गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। अब अदालत ने इस आदेश के प्रभाव को अस्थायी रूप से रोक दिया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक विशेषज्ञ समिति अपनी रिपोर्ट नहीं सौंप देती, तब तक अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालत ने राज्यों को यह सुनिश्चित करने को कहा कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पुराने आदेशों का सख्ती से पालन हो।
वहीं, केंद्र सरकार ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि अरावली क्षेत्र का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब भी संरक्षित है और परिभाषा में बदलाव का उद्देश्य खनन को बढ़ावा देना नहीं था। हालांकि, पर्यावरण संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पर चिंता जताई है और वैज्ञानिक आधार पर स्पष्ट परिभाषा की मांग की है।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर भारत की जलवायु, भूजल रिचार्ज और जैव विविधता के लिए बेहद अहम है। यहां होने वाला अवैध खनन न केवल जंगलों को नष्ट करता है, बल्कि दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान में बढ़ते प्रदूषण और जल संकट के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की जाने वाली विशेषज्ञ समिति पर टिकी हैं, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर अरावली के संरक्षण और भविष्य की नीति तय की जाएगी।



