उत्तराखंड

रामनगर में लूट-डकैती, बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न के पांच अभियुक्त बरी, 2016 के मामले में HC का फैसला

कृतिका भारद्वाज 

जनादेश /नैनीताल। हाई कोर्ट ने रामनगर में जुलाई 2016 की घर में डकैती कर लूटपाट करने, परिवार के सदस्यों पर हमला करने, मां के सामने ही दो बच्चियों के साथ दुराचार करने के सनसनीखेज मामले में पांच अभियुक्तों की अपील स्वीकार करते हुए एडीजे व विशेष न्यायाधीश पॉक्सो हल्द्वानी का आदेश रद कर दिया।कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।कोर्ट ने अभियोजन के संस्करण में प्रमुख साक्ष्यों में भी कमी पाई।

न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी व न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने आपराधिक अपीलों का निपटारा करते हुए आरोपित सफीक कुरैशी, रोहित, आमिर मोहम्मद उर्फ छोटू, निजामुद्दीन और शौकीन मेवाती को आईपीसी की धारा-395 और 376-डी और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(ग)/6 के तहत, निजामुद्दीन और सफीक कुरैशी को आईपीसी की धार- 412 के तहत, जबकि निजामुद्दीन को शस्त्र अधिनियम के मामले में धारा 4/25 के तहत सुनाई गई सजा से भी बरी किया गया।अदालत ने आदेश दिया कि जेल में बंद अपीलकर्ता यदि किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें धारा 437-ए सीआरपीसी के तहत बांड के अधीन तत्काल रिहा किया जाए।

अभियोजन के अनुसार जुलाई 2016 की रात को 10 से 12 सशस्त्र बदमाश पीड़ित परिवार के घर में घुसे, गहने और अन्य सामान लूटन के साथ ही दो बेटियों पर यौन हमला किया।

इस मामले में एडीजे व पॉक्सो कोर्ट हल्द्वानी की ओर से आरोपितों को विभिन्न धाराओं में दोषी करार देते हुए दस-दस साल कठोर कारावास व जुर्माने की सजा सुनाई की, जिसे आरोपितों की ओर से हाई कोर्ट में अपील दायर कर चुनौती दी।
पहचान की विफलता रही मुख्य वजह
कोर्ट के निर्णय के अनुसार आरोपितों को बरी करने का एक मुख्य कारण पहचान की विफलता थी। प्राथमिकी में किसी आरोपित का नाम नहीं था। कोर्ट ने नोट किया कि प्रमुख गवाह पीड़िताएं व उसकी मां ने कहा कि हमलावरों ने अपने चेहरे ढके हुए थे, केवल उनकी आंखें दिखाई दे रही थीं।पीठ ने पाया कि इससे बाद में न्यायालय में पहचान अविश्वसनीय हो गई, खासकर जब कोई पहचान परेड नहीं कराई गई थी। सबूतों का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि यह दिखाने के लिए कोई सामग्री नहीं थी कि अपीलकर्ताओं, या उनमें से किसी की सही पहचान की गई थी। इस आधार पर ही अभियोजन का मामला विफल हो गया।

खंडपीठ ने चिकित्सा साक्ष्य को भी संदिग्ध पाया। हालांकि अभियोजन गवाहों ने कहा कि पीड़ितों को बुरी तरह पीटा गया था। 24 जुलाई 2016 की पहली चिकित्सा जांच में किसी भी पीड़ित पर चोटें दर्ज नहीं की गईं। चोटें केवल 26 जुलाई 2016 की बाद की जांच में दर्ज की गईं।

अदालत ने कहा कि यह विसंगति अभियोजन के मामले को और कमजोर करती है और इस पर संदेह उठाती है कि क्या वे चोटें कथित घटना से जुड़ी हो सकती हैं।

कोर्ट ने गहनों और चाकू की कथित बरामदगी के साक्ष्य को अविश्वसनीय पाया। यह माना कि बरामद गहनों की पहचान अवैध थी क्योंकि पहचान प्रक्रिया के दौरान जांच अधिकारी मौजूद थे।

कोर्ट ने आरोपित निजामुद्दीन से चाकू की बरामदगी के संबंध में साक्ष्य को अपर्याप्त रूप से विश्वसनीय पाया, स्वतंत्र सार्वजनिक गवाहों की अनुपस्थिति और तलाशी प्रक्रिया में कमियों को नोट करते हुए।

पाया कि हल्द्वानी की विशेष कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराने और सजा देने में गलती की थी। अपीलकर्ताओं की ओर से बहस अधिवक्ता खुशी चौधरी ने की।एडीजे कोर्ट ने यह सुनाई थी सजा
आइपीसी की धारा 395 के तहत, 10 वर्ष के कठोर कारावास और प्रत्येक पर दस-दस हजार जुर्माना।
आइपीसी की धारा 376-D के तहत, आजीवन कठोर कारावास और प्रत्येक पर 20-20 हजार जुर्माना।
पाक्सो अधिनियम की धारा 5(जी)/6 के तहत, आजीवन कठोर कारावास और प्रत्येक पर 20-20 हजार जुर्माना।
-निजामुद्दीन व शफीक कुरैशी को आइपीसी की धारा-412 के तहत 10 वर्ष कठोर कारावास व दस-दस हजार जुर्माना।

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